Saturday, November 21, 2009
पाकिस्तान के जनकवि हबीब जालिब की कविताएं खुद उन्ही की जुबानी
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समकालीन जनमत
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Thursday, November 19, 2009
जनसंस्कृति मंच का 'मुक्तिबोध स्मृति फ़िल्म और कला उत्सव'
(१३-१५, नवम्बर, २००९):एक संक्षिप्त रिपोर्ट
मुक्तिबोध के जन्मदिवस पर शुरु हुआ भिलाई में जन संस्कृति मंच का 'मुक्तिबोध स्मृति फ़िल्म और कला उत्सव'( १३-१५, नवम्बर, २००९). प्रथम मुक्तिबोध स्मृति व्याख्यानमाला की शुरुआत की जसम के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. मैनेजर पांडेय ने. उन्होंने मुक्तिबोध की प्रतिबंधित पुस्तक, "भारत: इतिहास और संस्कृति' को ही अपने व्याख्यान का विषय बनाते हुए उसकी मार्फ़त अपने समय को जानने समझने की प्रक्रिया को रेखांकित किया. उन्होंने मांग की कि १९६२ में मुक्तिबोध की पुस्तक, "भारत: इतिहास और संस्कृति " पर लगाया गया प्रतिबंध मध्य प्रदेश सरकार वापस ले. ऎसा करते ही अदालत द्वारा प्रतिबंध की अनुशंसा खुद-ब-खुद समाप्त हो जाएगी. बाद में इसे प्रस्ताव के रूप में सदन ने भी पारित किया. इस व्याख्यान से पहले मुक्तिबोध के बड़े बेटे रमेश मुक्तिबोध ने अपने पिता की कुछ यादों को श्रोताओं के सामने रखा जिसे सुनकर कईयों की आंखें छलछला आईं. उन्होंनें खासकर उन दिनों को याद किया जब १९६२ में यह प्रतिबंध लगा था, जब मुक्तिबोध का पक्ष सुनने को कोई तैय्यार न था, जब उनपर हमले हो रहे थे और कांग्रेसी सरकार ने इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने की जनसंघ (आर.एस.एस.)की मांग को पूरा किया. इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे 'समकालीन जनमत' के प्रधान संपादक रामजी राय ने मुक्तिबोध की कविताओं से उद्धरण देते हुए यह स्थापित किया कि मुक्तिबोध आज़ादी के बाद की सत्ता-संरचना के सामंती और साम्राज्यवादी चरित्र को पहचानने वाले और उसकी फ़ासिस्ट परिणतियों को रेखांकित करने वाले हिंदुस्तान के पहले और सबसे ओजस्वी कवि-बुद्धिजीवी थे. रामजी राय ने स्पष्ट कहा कि मुक्तिबोध की ग्यानात्मक-संवेदना उनकी पार्टी की कार्यनीति के ठीक खिलाफ़ यह दिखला रही थी कि नेहरू-युग की चांदनी छलावा थी, कि देश का पूंजीपति वर्ग विदेशी पूंजी पर निर्भर था, कि पूंजीवादी-सामंती राजसत्ता साम्प्रदायिक ताकतों के आगे सदैव घुटने टेकने को शुरू से ही मजबूर थी, जैसा कि मुक्तिबोध की पुस्तक पर प्रतिबंध के संदर्भ में उद्घाटित हुआ और उसके पहले और बाद में भी जिसके असंख्य उदाहरण हमारे सामने हैं. इस सत्र में कवि कमलेश्वर साहू की पुस्तक 'पानी का पता पूछ रही थी मछली' का विमोचन प्रों पांडेय ने किया. सत्र में श्रीमती शांता मुक्तिबोध (ग.मा. मुक्तिबोध की जीवन-संगिनी)व श्री रमेश मुक्तिबोध के लिए सम्मान-स्वरूप स्मृति-चिन्ह श्री रमेश मुक्तिबोध को जन संस्कृति मंच की ओर से प्रो. मैनेजर पांडेय ने प्रदान किया. ग्यातव्य है कि श्रीमती शांता मुक्तिबोध अस्वस्थता के कारण स्मृति समारोह में नहीं आ सकीं. इसके ठीक बाद कवि गोष्ठी मे सर्वश्री मंगलेश डबराल. वीरेन डंगवाल और विनोद कुमार शुक्ल ने अपनी कविताओं का पाठ किया. हमारे समय के तीन शीर्ष कवियों का मुक्तिबोध की स्मृति में यह काव्यपाठ छत्तीसगढ़ के श्रोताओं के लिए यादगार हो गया. इस काव्य-गोष्ठी के ठीक बाद मंच से गुरु घासीदास विश्विद्यालय में पिछले ५ सालों से मुक्तिबोध की कविताओं को दुर्बोध बताते हुए पाठ्यक्रम से हटाए रखने की निंदा की गई और उनकी कविताओं को पाठ्यक्रम में वापस लिए जाने की मांग की गई.
भिलाई -दुर्ग स्थित कला-मंदिर में इस समारोह में भाग लेने वाले तमाम कलाकारों के चित्रों के साथ महान प्रगतिशील चित्रकार चित्तो-प्रसाद के चित्रों की प्रदर्शिनी लगाई गई. सर्वश्री हरिसेन, सुनीता वर्मा, तुषार वाघेला, गिलबर्ट जोज़फ़, एफ़.आर.सिन्हा, डी.एस.विद्यार्थी, रश्मि भल्ला, ब्रजेश तिवारी. अंजलि, पवन देवांगन, रंधावा प्रसाद ,उत्तम सोनी आदि चित्रकारों के चित्र प्रदर्शित किए गए. सर्वश्री धनंजय पाल , कुलेश्वर चक्रधारी, ईशान, विक्रमजीत देव तथा खैरागढ़ से आए विद्यार्थियों की बनाई मूर्तियां भी प्रदर्शित की गईं. सर्वश्री अर्जुन और महेश वर्मा के बनाए खूबसूरत कविता-पोस्टर भी प्रांगण में सजाए गए थे. १३ नवम्बर के दिन की अंतिम प्रस्तुति थी सुश्री साधना रहटगांवकर का सूफ़ी गायन. गायन का यह सत्र प्रख्यात गायिका गंगूबाई हंगल तथा इकबाल बानो की स्मृति को समर्पित था.
१४ ववम्बर के दिन 'मांग के सिंदूर ' नाम के छत्तीसगढ़ी नाट्य-गीत संगठन के खुमान सिंह यादव और साथियों ने नाचा शैली के गीत और नाट्य पेश किए. उसके बाद बच्चों ने जनगीत प्रस्तुत किए.यह सत्र महान रंगकर्मी श्री हबीब तनवीर व नाट्य लेखक श्री प्रेम साइमन की याद को समर्पित था. दोपहर ३ बजे फ़िल्मोत्सव का उदघाटन विख्यात फ़िल्म-निर्देशक एम.एस. सथ्यू के हाथों हुआ. उदघाटन- सत्र की अध्यक्षता श्री राजकुमार नरूला ने की जबकि जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण और फ़िल्मोत्सव के संयोजक संजय जोशी ने विशेष अतिथियों के बतौर समारोह को संबोधित किया. श्री प्रणय कृष्ण ने कहा कि जिस तरह तेल के लिए अमरीका ने ईराक को तबाह किया, उसी तरह अल्यूमिनियम , बाक्साइट आदि खनिजों के लिए हमारे देश की सरकार छत्तीसगढ़, उड़ीसा और पूरे मध्य भारत के जंगलों, पहाड़ों और मैदानों में रहने वाले अपने ही नागरिकों के खिलाफ़ बड़े पूंजीपति घरानों के लाभ के लिए युद्ध छेड़ चुकी है. देश की सभी शासक पार्टियां भूमंडलीकरण पर एकमत हैं , लेकिन हर कहीं बगैर किसी संगठन, पार्टी और विचारधारा के भी गरीब जनता इस कार्पोरेट लूट के खिलाफ़ उठ खड़ी हो रही है, वह कलिंगनगर हो या सिंगूर, नंदीग्राम या लालगढ़. अपनी आजीविका और ज़िंदा रहने के अधिकार से वंचित, विस्थापित लोग अपनी ज़मीनों, जंगलों और पर्यावरण की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं. चंद लोगों के विकास की कीमत बहुसंख्यक आबादी और पर्यावरण का विनाश है. मुक्तिबोध और उनकी कविता इस संघर्षरत आम जन की हमसफ़र है. श्री एम.एस. सथ्यू ने औद्योगिक विकास की रणनीति और माडल पर अपनी दुविधाओं को व्यक्त किया. श्री संजय जोशी ने फ़िल्म समारोहों की जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित श्रृंखलाओं को कारपोरेट, सरकारी और स्वयंसेवी समूहों पर आर्थिक निर्भरता से मुक्त जन-निर्भर संस्कृति- कर्म का उदाहरण बताया. १४ नवंबर के दिन चार्ली चैपलिन की 'माडर्न टाइम्स', गीतांजलि राय की एनिमेशन फ़िल्म 'प्रिंटेड रेनबो', विनोद राजा की डाक्यूमेंटरी 'महुआ मेमोयर्स' तथा डि सिका की क्लासिक 'बायसिकिल थीफ़' को सैकड़ों दर्शकों ने न केवल देखा, बल्कि उन पर चर्चा भी की. १५ नवम्बर के दिन पहला सत्र बच्चों की फ़िल्मों का था. पूरा कला-मंदिर बच्चों से भर उठा. यह सत्र रिषिकेश मुकर्जी और नीलू फुले की स्मृति को समर्पित था. इसमें राजेश चक्रवर्ती की 'हिप हिप हुर्रे', रैंडोल की बाल-फ़िल्म श्रंखला 'ओपन द डोर' और माजिद मजीदी की ईरानी फ़िल्म 'कलर आफ़ पैराडाइज़' दिखाई गईं.
इस दिन फ़िल्मों का दूसरा सत्र छत्तीसगढ़ी नाचा के अप्रतिम कलाकार मदन निषाद और फ़िदाबाई की स्मृति को समर्पित था. इस सत्र में मिशेल डी क्लेरे की 'ब्लड ऐंड आयल', सूर्यशंकर दास की 'नियामराजा का विलाप', अमुधन आ.पी. की 'पी (शिट)', बीजू टोप्पो और मेघनाथ की 'लोहा गरम है', तुषार वाघेला की 'फ़ैंटम आफ़ ए फ़र्टाइल लैंड ' जैसी जन-प्रतिरोध की डाक्य़ूमेंटरी फ़िल्मों का प्रदर्शन किया गया. अंतिम सत्र चित्रकार मंजीत बावा, तैय्यब मेहता एवं आसिफ़ की स्मृति को समर्पित था. इस सत्र में मंजिरा दता की "बाबूलाल भुइयन की कुर्बानी' और एम.एस. सथ्यू की 'गर्म हवा' प्रदर्शित की गईं. चर्चा सत्र में सैकड़ों दर्शकों के साथ फ़िल्म के बारे में एम.एस. सत्थ्यू ने देर रात तक चर्चा की. इसके बाद तीन द्विवसीय 'मुक्तिबोध स्मृति फ़िल्म और कला उत्सव' का समापन -सत्र सम्पन्न हुआ.
-अर्जुन
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Wednesday, November 18, 2009
भूपेन की राह चले सुमन चटोपाध्याय
कबीर सुमन की भी वही हालत होने जा रही है जो कुछ साल पहले भूपेन हजारिका की हुई थी। कबीर सुमन को अब जाकर यह एहसास हुआ कि तृणमूल कांग्रेस तो वैसी ही है जैसी सीपीएम या कांग्रेस।
कबीर सुमन 24 परगना के यादवपुर संसदीय क्षेत्र से सांसद है। कबीर का कहना है कि वे सांसद विकास निधि के बारे में जब भी पूछते हैं तो तृणमूल नेता उन्हे कहते हैं कि आप घर पर रहो अपना गाने बजाने का काम करो ...सब ठीक-ठाक चल रहा है। उन्हे साफ पता है कि ये पैसा आम लोगों के विकास के काम में नहीं उपयोग हो रहा है। तृणमूल सुमन ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि जब वह पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के सामने समस्याओं को उठाते हैं, वह खारिज कर देती हैं। बकौल सुमन-'जब उनसे समस्याओं को लेकर कुछ कहता हूं, वह कहती हैं कि मुझे गिटार कब सिखाओगे।' सुमन का कहना है कि पार्टी में उनका दम घुट रहा है। खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस जनता के लिए कुछ नहीं कर रही है।
सुमन का कहना है कि -'मैं सिर्फ एक सांसद के तौर पर काम नहीं कर सकता। मैं पार्टी का गुलाम बनकर रह गया हूं। मैं घुटन महसूस कर रहा हूं।'
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने कबीर के बयान पर कहा कि यह एक सामान्य बात है जिसे तूल नहीं दिया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबको स्वतंत्र तरीके से अपने विचार रखने का अधिकार है। कबीर सुमन एक मेहमान हैं तृणमूल के एक्टिविस्ट नहीं है..। शायद तभी उन्होने भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने की हिम्मत कर डाली। लेकिन कबीर आप इतने भी तो भोले न थे। जनता जिस वजह से आपको सम्मन देती है वो आपकी आवाज है। व्यवस्था को लेकर आप ठगा महसूस कर सकते है लोगों को तो ठगे जाने की आदत है। बस थोड़ा दुख है कि आपको ठगे जान का एहसास अब हुआ।
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Wednesday, November 11, 2009
कारवां बढ़ता रहेगा
-सुधीर सुमन
शशिभूषण नहीं रहा, इसका मुझे यकीन नहीं हो रहा है। दिल्ली में मानो वह नए सिरे से मुझे मिला था, श्रीराम सेंटर के पास एक दिन। एनएसडी के पूर्व छात्र विजय कुमार के साथ 1999 में ‘रेणु के रंग’ लेकर पूरे देश के भ्रमण पर निकला था, तबसे उससे कभी-कभार ही मुलाकात हो पाती थी। इस बीच वह उषा गांगुली की टीम में एक साल रहा, गोवा नाट्य अकाडमी से दो या तीन वर्षों का डिप्लोमा कोर्स किया। संजय सहाय के रेनेसां के लिए वर्कशॉप किए। बंबई में रहा और वहां भी सेंतजेवियर के छात्रों के लिए वर्कशॉप करता था। बंबई के रास्ते ही वह एनएसडी में पहुंचा था। आज हर जानने वाला शशि द्वारा किए गए नाटकों को याद कर रहा है, किसी को हाल ही में मिर्जा हादी रुस्वा के उमरावजान अदा के उसके निर्देषन की याद आ रही है तो किसी को बाकी इतिहास और वेटिंग फॉर गोदो में उसके अभिनय की, कोई रेणु की प्रसिद्ध कहानी रसप्रिया में उसकी अविस्मरणीय भूमिका को याद कर रहा है तो कोई हजार चैरासीवें की मां और महाभोज में निभाए गए उसके चरित्रों को।
समकालीन जनमत के नए अंक की तैयारी के सिलसिले में मैं इलाहाबाद गया हुआ था, 2 नवंबर को दिल्ली पहुंचा और शाम में बच्चों के राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव ‘जश्ने बचपन’ के लिए टिकट ख़रीदते वक्त शशि को कॉल किया। उसके मोबाइल की घंटी देर तक बजती रही, इसके पहले कि कोई रिकार्डेड आवाज सुनाई देती कि एनसर देने वाला मौजूद नहीं है, उसकी धीमी ठहरी हुई आवाज सुनाई पड़ी। मुझे लगा कि नींद से जागने के बाद बोल रहा है, पूछा- सो रहे थे क्या? उसने कहा- मैं तो हॉस्पीटल में हूं। ‘क्यों, क्या हुआ?’- मैंने तुरत पूछा। उसने जैसे आश्वस्त करते हुए कहा कि डॉक्टर ने जॉन्डिस बताया है, ज़्यादा चिंता की बात नहीं है। मैंने फिर पूछा- हॉस्पीटल का नाम बताओ। उसने बताया- एनएमसी, नोएडा मेडिकल सेंटर है शायद पूरा नाम। मैंने कहा- मैं फिर कॉल करूंगा, मुझे उस हॉस्पीटल का पता बताना, कल या परसों आऊंगा। फिर उसकी आश्वस्त करती आवाज़्ा आई- अरे, इतना चिंता करने की बात नहीं है, कल मैं डिस्चार्ज हो जाऊंगा।
4 नवंबर की सुबह मुझे उसकी याद आई, सोचा कि वह तो हाॅस्टल लौट चुका होगा, आज शाम में मिलूंगा। मगर दोपहर बाद ढाई बजे के आसपास उसके दोस्त प्रकाश जो छात्र संगठन आइसा में सक्रिय है, उसका फोन आया पटना से, कि शशि की डेथ हो गइ्र्र है। उसके तत्काल बाद एनएसडी के अन्य परिचितों को फोन किया, मालूम हुआ कि 3 नवंबर को उसे डिस्चार्ज कर दिया गया था, लेकिन हॉस्पीटल से बाहर निकलते वक्त बेहोश होकर गिर गया और आज दिन के 1 बजे के आसपास उसकी मौत हो गई। वह शशि जिसकी जीवटता के किस्से अक्सर उसके साथी सुनाया करते थे, उसकी इस तरह मौत हो सकती है, इस पर कतई यकीन नहीं होता। हमें इलाज की प्रक्रिया पर संदेह है और यह निराधार नहीं है।
यह सही है कि विजय कुमार की कोशिशों के बाद उसका पोस्टमार्टम हुआ और अभी पोस्टमार्टम की रिपोर्ट नहीं आई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट जो भी आए, उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए और साथ ही वह मेडिकल रिपोर्ट भी, जिसे एनएसडी प्रशासन किसी को देखने नहीं दे रहा था। आखिर ये कैसी इलाज पद्धति है और मरीज के प्रति कैसा केयर कि 29 अक्टूबर को एनएसडी बुखार के इलाज के लिए शशि को उस हॉस्पीटल में भेजती है, 31 अक्टूबर को उसे स्वस्थ बताकर वहां से वापस भेजने की तैयारी होती है, उसी दौरान उसे चक्कर आता है, तब फिर से जांच होती है और बताया जाता है कि उसे प्राइमरी स्टेज का जाॅन्डिस है और फिर उसे 3 नवंबर को बकायदा डिस्चार्ज किया जाता है, उसके बाद जब वह बेहोश होता है तो ज्ञानी डॉक्टरों को पता चलता है कि उसे डेंगू है। क्या यह लापरवाहीपूर्ण रवैया नहीं है? क्या उसके मौत की वजहों की जांच नहीं होनी चाहिए?
यह भी चर्चा है कि एनएमसी किडनी रैकेट के लिए भी बदनाम हो चुका है, आखिर ऐसे हॉस्पीटल के साथ एनएसडी के रिश्ता ही क्यों है? रंगकर्मी अतुल शाही ने एक ब्लाॅग पर ठीक ही सवाल उठाया है कि उस हॉस्पीटल से कॉन्ट्रैक्ट किस आधार पर किया गया? 40 कि.मी. दूर के हॉस्पीटल से कॉन्ट्रैक्ट क्यों? फैकल्टी और स्टूडेंट के लिए अलग हॉस्पीटल क्यों? उसे देखने विद्यालय की तरफ से कोई वहां क्यों नहीं गया? एनएसडी प्रशासन की ओर से न कोई शोक संवेदना व्यक्त की गई और न ही इस
मामले पर कोई बयान आया है, एक सचेत कोशिश है कि इस मौत पर पर्दा डाल दिया जाए। वे कैसे कला-साधक हैं जो एनएसडी के तंत्र में बैठे हैं? उनकी संवेदना को हो क्या गया है? यह कैसा ड्रामा है जो इस नेशनल स्कूल में खेला जा रहा है? क्या इस देश में मानवीय चेहरे का मुखौटा लगाकर एक जनविरोधी तंत्र का जो लोग संचालन कर रहे हैं उन्हीं का एक छोटा नमूना यह विद्यालय भी है? अगर शशि की मौत के लिए यह तंत्र दोषी नहीं है, तो यही कहा जाएगा न कि उसका दुर्भाग्य था जो वह एनएसडी आया और इलाज के लिए उस हॉस्पीटल में भेजा गया और डॉक्टर उसकी बीमारी समझ नहीं पाए! जिस तरह एनएसडी प्रशासन उसकी मृत्यु को स्वाभाविक या किसी कलाकार की व्यक्तिगत ट्रैजडी या नियति की तरह देख रहा है और जिस तरह उसे भूला देने की कोशिश हो रही है, वह मामले को और भी संदिग्ध बना रहा है।
एनएसडी के महानुभावों के लिए होगा वह एक सामान्य छात्र, एक बीमारी ने जिसका किस्सा तमाम कर दिया, लेकिन वह सिर्फ़ एक छात्र ही नहीं था। 1991 से 2009 तक, रंगमंच की दुनिया में अठारह साल का लंबा सफ़र तय करके वह एनएसडी पहुंचा था अपनी बेलौस अदा, कस्बाईपन और अपनी सामाजिकता के साथ, रंगकर्म के अभिजात्यपन और अमीरपरस्ती से मुठभेड़ करता हुआ। उसकी मृत्यु के दूसरे दिन एनएसडी के कैंपस में अंधेरे में खड़े उसके कुछ शोकग्रस्त साथियों में से किसी एक ने मौत के बाद हो रही उपेक्षा की चर्चा चलने पर सही ही कहा कि शशि जैसी पृष्ठभूमि से आने वाले रंगकर्मियों को जिंदा रहते हुए भी इन संस्थानों में कम उपेक्षा नहीं सहनी पड़ती। मगर यह भी सच है कि उसे उपेक्षा की कोई परवाह भी नहीं थी।
उपेक्षा और अभाव में तो उसने जन्म ही लिया था। वह इससे कभी भी बहुत परेशान नहीं रहा। बल्कि इसके विरुद्ध हमेशा हिम्मत और जिजीविषा के साथ संघर्षरत रहा। राजन, शशिभूषण, संतोष झा और बबलू, अमरेंद्र, अशोक, संजय, उमेश, संजय यादव जैसे किशोर सभी एक जैसे वर्गीय पृष्ठभूमि के थे, जो 1990 के आसपास पटना रेडियो स्टेशन के पास उमा बालेश्वर चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा संचालित चिल्ड्रेन्स लाइब्रेरी में मिले थे। वहीं कॉमिक्स आदि पढ़ते हुए ये क़रीब आए। जो महिला (आंटी) लाइब्रेरी चलाती थीं, वे इन्हें जबरन ज्ञान-विज्ञान की और किताबें भी पढ़ने को कहतीं। ये पढ़ते भी थे। संतोष झा उस वक्त को याद करते हुए कहते हैं कि हमारे घरों में इतनी जगह नहीं थी कि ठीक से पढ़ा जा सके, लाइब्रेरी में हम पढ़ते भी थे और दूरदर्शन पर आने वाली साप्ताहिक फिल्में और महाभारत जैसे सीरियल भी देख पाते थे। वहीं एक गुरु जी आते थे, जिनसे संतोष ने हारमोनियम बजाना और शशि ने तबला बजाना सीखना शुरू किया। उसी दौरान इनलोगों ने एक नाटक भी किया- नमन करो, जो काजी नजरूल इस्लाम का लिखा हुआ था। वहीं ये सारे किशोर जनसंस्कृति मंच के प्रभारी अनिल अंशुमन के संपर्क में आए और इनमें से कई हमेशा के लिए जसम की स्थानीय इकाई हिरावल का अभिन्न अंग बन गए।
जनसांस्कृतिक आंदोलन के एक्टिविस्ट विचारक, कवि और पत्रकार महेश्वर के एक चर्चित गीत ‘तख्त बदल दो ताज बदल दो/ बदलो सकल समाज कि दुनिया नई नई हो, जमाना नया नया हो’ में एक पंक्ति यूं आती है- नए क्षितिज की ओर हवा के पंख पसारे/ नए बादलों के छौने उड़-उड़ बटुराएं’। वाकई इन किषोरों के रूप में भी नए बादलों के छौने बटुरा रहे थे जिन्हें सांस्कृतिक आंदोलन में अपनी भूमिकाएं निभानी थी। महेश्वर जी की जीवन रक्षा के लिए कोष जुटाने के लिए जो अभियान चल रहा था उसमें नुक्कड़ नाटकों की सघन प्रस्तुतियों के दौरान लोगों से सहयोग इकट्ठा कर इन किशोरों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान किया। संतोष झा का मानना है कि उन नुक्कड़ नाटकों की प्रस्तुतियों के दौरान ही हमलोगों को महसूस हुआ कि हम किसी बड़़े मकसद के साथ जुड़ गए हैं।
संतोष झा को वे दिन याद आते हैं जब शशि पतला दुबला घुंघराले बालों वाला बेहद चंचल किशोर था, तब पटना म्यूजियम में प्रवेश पर पाबंदी नहीं थी। ये सारे किशोर वहां रखे तोप और जार्ज पंचम की मूर्तियों पर चढ़कर झुलते रहते थे। वही शशि ने मोम से कुछ लिख दिया था जो चार-पांच साल तक नज़र आता रहा। हां, सचमुच उसने जो जीवन जीया वह भी इतनी आसानी से नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। शशि को पहले पहल मैंने जनसंस्कृति मंच के सम्मेलनों और अन्य कार्यक्रमों में देखा था। आत्मविश्वास से भरी, कर्मठ और मेहनतकश-सी उसकी छवि हमेशा मेरे जेहन में रहेगी। किसी दक्षिण भारतीय अभिनेता-सा सांवला आकर्षक चेहरा था उसका और चाल में एक मजबूती और बेफिक्री दिखती थी। सीपीआई (एमएल) के महत्वपूर्ण अभियानों के दौरान होने वाली सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में वह अक्सर नज़र आ जाता था। दिसंबर 1992 में कलकत्ता रैली जिसमें सीपीआई (एमएल) ओवरग्राउन्ड हुई
थी उसमें जिद करके ये किशोर रंगकर्मी भी पहुंच गए थे। संतोष झा ने बताया कि रात में कड़कड़ाती ठंढ में शशि ने सारे साथियों को कहा कि तुमलोग सो जाओ मैं जागता रहूंगा और वह जागता रहा। सुबह प्यास लगी तो वह बेहिचक सामने एक चमचमाते होटल के अंदर गया और पानी पीकर चला आया। साथियों ने पूछा कि यह कैसे संभव हुआ, तो उसने बताया कि इतना बड़ा होटल है अंदर पानी होगा ही यह मुझे मालूम था, ख़रीदार की तरह गया और पानी पीकर चला आया। इसी तरह उसके नक्शेक़दम चलके सारे साथियों ने अपनी प्यास बुझाई।
भोजपुर जहां मैं जसम से जुड़ा, वहां की नाट्य संस्था युवानीति के साथियों के साथ भी उसके बड़े गहरे रिश्ते थे। धनंजय जो उसी की तरह ढोलक या नाल के बल पर जनगीतों को और असरदार बना देते थे उनके साथ उसकी बहुत गहरी छनती थी। धनंजय ने बताया कि जैसा आमतौर पर होता है शुरू के दौर में घरवालों के साथ भी उसका भीषण संघर्ष चला। उसने रंगकर्म के रास्ते से अलग होना मंजूर नहीं किया। हाल ही में वह आरा आया तो सारे साथियों के साथ मिला। धनंजय ने बताया कि पार्टी (सीपीआई-एमएल) के बड़े कार्यक्रमों में वह जरूर मौजूद रहता था।
हिरावल की नियमित गतिविधियों से दूर होने के बाद कहीं वह टिककर नहीं रहा। अब दोस्त उम्मीद कर रहे थे कि एनएसडी में दाखिले के बाद तीन वर्ष तक वह टिककर रहेगा, लेकिन यहां से उसने हमेषा के लिए विदा ले ली। हां, उसने रंगमंच को अपने जीवनयापन का जरिया भी बनाना चाहा, पर जैसा सपना लेकर बहुत सारे काबिल कलाकार बंबई का धूल फांक रहे हैं, शायद वैसी कोई महत्वांकाक्षा या भ्रम वह पाले हुए नहीं था। वह तो शायद प्रशिक्षण देकर ही अपना जीवन चला लेता जिसकी अभी उसे उतनी कीमत नहीं मिलती थी जितनी एनएसडी का लेबल लगे किसी प्रशिक्षक को मिलती है। जब उससे एनएसडी मे दाखिला के वक्त इंटरव्यू में पूछा गया कि यहां क्यों आना चाहते हो? तो उसका बेबाक जवाब था कि क्यों आना चाहते हैं! उसीलिए आना चाहते हैं जिसके लिए सब आते हैं, कुछ सीख भी लेंगे और एक सर्टिफिकेट भी मिल जाएगा जो आगे मेरे काम आएगा।
सीखने से उसे कभी परहेज नहीं था। उसने कई उस्तादों को करीब से देखा था। मशीन की तरह ड्रामे के स्कूल में जो सीखाया जाता है, जरा भी अवकाश नहीं दिया जाता, वह इस प्रक्रिया में नहीं निर्मित हुआ था। काम करते हुए उसे सीखने की आदत थी। चाहे गांवों और नुक्कड़ों में होने वाले नाटक और जनगीतों की प्रस्तुति हो या उस्तादों की संगत या किसी भी शो में मदद के लिए तैयार रहने की उसकी आदत, उससे उसकी प्रतिभा निखरी थी। किसी को लाइट करने वाला नहीं मिल रहा है तो शशि हाजिर, किसी के मेकअप और वस्त्र-सज्जा में हाथ बंटाता शशि, कभी 15 दिन की तैयारी में कोई नाट्य प्रस्तुति की चुनौती लेता निर्देशक शशि, कभी साहित्यिक पात्रों को अपने अभिनय के जरिए जीवंत करता शशि। कितने कितने रंग थे उसके! कुछ माह पहले लोकसंस्कृति पर केंद्रित आयोजन के लिए हिरावल को जोगिया (कुशीनगर) जाना था, ऐन मौके पर नाल बजाने वाले की समस्या, मालूम हुआ कि शशि पटना में है और शशि सहर्ष जाने को तैयार!
संतोष बताता है कि शशि को कुछ कह दीजिए, वह उससे इनकार नहीं करता था। किसी तरह उसे पूरा करने में जुट जाता था। कई बार कहीं से लौटकर आता था और कहता कि कहीं उससे कहा गया कि नाटक तैयार करवा दो तो उसने नाटक खड़ा कर दिया, लोग तैयारी कर रहे हैं। एक दिन श्रीराम सेंटर पर हबीब तनवीर के नाटक ‘चरणदास चोर’ की फोटो काॅपी देने के बाद उसने बताया कि उसे एक टास्क दिया गया है कि बिना किसी खास उपकरण के किसी भाव को अभिनय के जरिए अभिव्यक्त करना है। और वह औषधीय गुणों से भरपुर तुलसी और अमीर खुसरों की प्रसिद्ध रचना ‘छाप-तिलक सब छिनी रे तोसे नैना लड़ाके’ के जरिए अपने भावाभिनय के उधेड़बुन में लगा था। मैंने गीत का भाव तो उसे समझाया पर उससे उसकी समस्या का हल नहीं हुआ, वह उसे अभिनय के जरिए पेश करना चाहता था। जाहिर है इस किस्म के टास्क को भी उसने अपने अंदाज में पूरा ही किया होगा।
मध्यवर्ग के कई ऐसे संस्कृतिकर्मी जो अक्सर जनता के प्रति किए गए अपने संस्कृतिकर्म के महिमामंडन में मग्न रहते हैं और जो किसी कारणवश उस सांस्कृतिक धारा से अलग होने पर उसके कटु विरोधी हो जाते हैं उनके बिल्कुल विपरीत था शशि। अपने मूल सांस्कृतिक संगठन और आंदोलन से जुड़े तमाम साथियों के प्रति उसमें मरते दम तक गहरी आत्मीयता रही। जिस साथीपन के माहौल में वह रहा था, वह शायद उस तरह एनएसडी के भीतर नहीं था, इसी कारण अक्सर वह बिहार के अपने दोस्तों के कमरों की ओर खींचा चला जाता था। मैंने एक दिन उससे कहा कि अब दिल्ली आ गए हो,
तो चलो कोई नाटक किया जाए। उसने कहा- थोड़े दिन रुक जाइए, बहुत काम लाद दिया है सबों ने। फिर उसने अचानक कहा‘- कोई ऐसी कहानी बताइए, जिसका मंचन किया जाए, जिसका थीम जोरदार हो। अचानक मुझे कोई कहानी याद नहीं आई। हाल में एक दोस्त से एक पुरानी कहानी की चर्चा हो रही थी, उसी की याद आई। मैंने कहा- संजीव की एक कहानी है, अपराध, बड़ी मशहूर कहानी है। यह पूरा तंत्र कितना जनविरोधी है इसे बड़ी कुशलता से उजागर करती है। और आजकल नक्सलवाद बड़ी चर्चा में है उसी पर है। उसने कहा- तो इसे करूंगा, थोड़ा फुर्सत मिलने दीजिए। मगर हमारी योजनाएं अधूरी रह गई।
हमने साथ-साथ बहुत काम नहीं किया, पर सोचता हूं कि संगठन के अतिरिक्त वह कौन-सी बात है जो मुझे उससे जोड़ती थी। मुझे वह भैया या भाई ही कहता था। पटना से बाहर निकलने के बाद जब भी उसके लौटने पर मुलाकात हुई वह उतनी ही आत्मीयता से मिला जितना पहले मिलता था। मुझसे आमतौर पर अपनी मौजूदा उपलब्धियों के बारे में कम बात करता था। अक्सर संगठन और साथियों के हालचाल ही पूछने या किसी सांस्कृतिक-राजनीतिक मुद्दे पर चर्चा में ही समय बीत जाता था। वह कला की किसी वंशानुगत विरासत का वारिस नहीं था, उसने जो सीखा सांस्कृतिक आंदोलन और अपने खुद के प्रयासों के जरिए सीखा, शायद इस वजह से भी वह मुझे प्रिय था। संयोग यह है कि जिस संगठन में उसका सांस्कृतिक व्यक्तित्व निर्मित हुआ, उस संगठन हिरावल के अधिकांश कलाकार ऐसे ही हैं और उन्होंने भी इसी प्रक्रिया में अपनी प्रतिभा को निखारा है। शशि और उसके तमाम साथी इसके ताकतवर साक्ष्य हैं कि सांस्कृतिक प्रतिभा किसी सुविधासंपन्न परिवेश, किसी खास वंश-परंपरा-परिवार या संस्थान की मुंहताज नहीं होती।
सलाम शशि,
तुम हमारे लिए नुक्कड़ों, खेत-खलिहानों और जनता के अरमानों में तो जिंदा रहोगे ही, उन संस्थानों में जहां तुम जैसी प्रतिभाओं को मुश्किल से प्रवेश मिलता है और जहां उन्हें उपेक्षा और मौत मिलती है, वहां भी जब कोई अज्ञात कुलशील कलाकार पूरे हक के साथ मजबूत कदमों से दाखिल होगा तो उसमें हम तुम्हारा अक्स देखेंगे। कारवां बढ़ता रहेगा, इसमें तुम्हें यकीन था, इसीलिए तो बार-बार लौटकर तुम हिरावल के पास आते थे। तुम्हारी याद हम सबको हमेशा आएगी।
पिछले 13 साल में बिहार में दूसरे रंगकर्मी की एनएसडी में असामयिक मृत्यु हुई है। पहले 1996 में विद्याभूषण द्विवेदी गए और अब शशिभूषण। इसे नियति नहीं बनने दिया जा सकता। शशि तो नियति को अस्वीकार करते हुए आगे बढ़ने का नाम था। जो जगह वर्गीय तौर पर तय कर दी गई हो उसे नामंजूर करने वालों में से था वह। जिस तरह पटना में रंगकर्मी प्रवीण की हत्या, छात्रनेता चंद्रशेखर की हत्या, गुजरात नरसंहार, कला विद्यालय समेत तमाम आंदोलनों की अगली कतार में मौजूद रहता था। आज अगर उसके होते एनएसडी में उसके किसी सहपाठी की उसकी तरह मौत हुई होती, तो उस मौत को स्वाभाविक बताने वालों के साथ वह खड़ा नहीं होता, बल्कि वह उस पर सवाल उठा रहा होता।
पटना समेत बिहार के विभिन्न शहरों में अगर हिरावल समेत तमाम संगठनों के रंगकर्मी, साहित्यकार-कलाकार आक्रोशित हैं तो यह आक्रोश ज्यादा स्वाभाविक है। पटना में संस्कृतिकर्मियों ने चार मांगें की है-
1. इस मौत की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच कमेटी से जांच करवाई जाए जिसमें दो विषेषज्ञ डॉक्टर भी शामिल हों।
2. अस्पताल की आपराधिक लापरवाही के मद्देनज़र एनएसडी प्रबंधन की भूमिका भी संदिग्ध लगती है, लिहाजा इसकी भी पड़ताल की जाए।
3. शशि आर्थिक रूप से अति सामान्य परिवार से आते थे, उनके परिवार के भरण-पोषण के लिए 25 लाख का मुआवजा दिया जाए
4. एनएसडी में उनके भाई को योग्यता अनुसार नौकरी दी जाए। अगर 15 दिनों के अंदर ये मांगे न मानी गईं तो बिहार के संस्कृतिकर्मी आंदोलन पर उतरेंगे।
आइए इन मांगों के पक्ष में हम भी अपनी आवाज को शामिल करें।
(आप सब जहां भी हों इसे जन संस्कृति मंच की ओर से अपने प्रिय साथी को दी गई श्रद्धांजलि के बतौर उनपर आयोजित शोकसभा में पढ़ें और साथ ही साथ पटना में साथियों ने उनकी मृत्यु की परिस्थितियों की जांच संबंधी जो मांगें उठाकर आंदोलन चलाया है उसके समर्थन में हस्ताक्षर अभियान और अन्य तरीकों से अपना सहयोग दर्ज़ कराएं.)
Posted by
समकालीन जनमत
at
9:23 AM
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